वास्तुशास्त्र में शयनकक्ष का महत्व - Direction Of BED-ROOM In VASTU SHASTRA : ज्योतिष औरा एवं वास्तु एक्सपर्ट डॉ उमाशंकर मिश्र 94150 87 711 वास्तु वास्तविक्ता पर आधारित एक शास्त्र है। जो वास्तव में है और जहां हम रहते (वास) करते हैं, उसे ही हम वास्तुशास्त्र कहते हैं। चारों दिशाओं एवं चारों विदिशाओं का अपना-अपना प्रभाव होता है। उनके अलग-अलग विशेष कार्य हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर, किसी भी प्रकार के वास्तु निर्माण के समय दिशा विशेष के प्रभावों से लाभ उठाना चाहिए। वास्तुशास्त्र में हम आठ दिशाओं का प्रयोग करते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में स्थित शयनकक्षों के शुभाशुभ प्रभाव : 1. ईशान (उत्तर-पूर्व) : पति-पत्नी के लिए उत्तर-पूर्व का शयनकक्ष शुभ नहीं होता। यहाँ सोने वाले विचलित हो सकते हैं और पुरूषों की कामेच्छा नहीं रह जाती तथा परिवार को आर्थिक एवं सामाजिक संकटों का सामना करना पड़ता है। 2. पूर्व : शयनकक्ष हेतु पूर्व की स्थिति अच्छी नहीं मानी जाती। इससे पुरूष रोगग्रस्त होते हैं और धन की हानि होती है। इसके प्रभाव से लड़कियाँ पैदा होती हैं, किन्तु बच्चों का शयनकक्ष इस दिशा में बनाया जा सकता है। 3. आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) : इस दिशा में शयनकक्ष होने से स्वास्थ्य खराब होता है और अदालती कार्यवाही में उलझन पड़ती है। बांझपन की स्थिति बनती है या विकलांग अथवा घमण्डी बच्चे जन्म लेते हैं। स्त्रियों को उदर संबंधी समस्याएँ होती हैं, पुरूष तनावयुक्त रहते हैं और लड़कियों को भी गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होती हैं तथा पति-पत्नी में निरन्तर झगड़े होने लगते हैं, इस प्रकार आग्नेय में शयनकक्ष होने पर पूरे परिवार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, अतः इस स्थिति से बचना ही उचित होगा। 4. दक्षिण : इस दिशा में शयनकक्ष होना शुभ है। यहाँ शयन करने वालों को विश्राम और शांति मिलती है। घर के लोगों में स्थिरता भी आती है। गृहस्वामी के बाद दूसरे वरिष्ठ सदस्य के लिए यह आदर्श दिशा है। 5. नैर्ऋतय (दक्षिण-पश्चिम) : शयन-कक्ष के लिए नैर्ऋत्य कोण सर्वश्रेष्ठ स्थिति है, विशेष रूप से गृह-स्वामी के लिए। यह धन-धान्य, स्वास्थ्य और समृद्धि देता है व वंश वृद्धि करता है। परिवार में जो व्यक्ति महत्वपूर्ण निर्णय लेता है, परिवार की समस्त जिम्मेदारियों का निर्वाह करता है, उसके लिए यह शयनकक्ष आदर्श है। यहाँ सोने वाले को मानसिक सुदृढ़ता भी प्राप्त होती है। 6 पश्चिम : पश्चिम दिशा का शयनकक्ष कल्याणकारी होता है। शयन करने वालों को खुशी तथा सुविधापूर्ण जीवन की प्राप्ति होती है। अतः वयस्कों के लिए इस दिशा का शयनकक्ष आदर्श स्थिति है। 7. वायव्य (उत्तर-पश्चिम) : यह चंचलता का कोण है। यदि गृहस्वामी अधिकतर घर से बाहर रहता है, तो इस दिशा में शयनकक्ष किया जा सकता है। अतिथियों एवं कन्याओं के लिए वायव्य कोण का शयनकक्ष आदर्श है। वास्तु के अनुसार यह दिशा वायु की है। अतः यहाँ निरन्तर ऊर्जा प्रवाह बना रहता है। यहाँ शयनकक्ष होने से मेहमान अधिक समय तक नहीं रूकेंगे तथा इसी प्रकार यहाँ पर रहने वाली कन्याओं के विवाह जल्दी हो जायेंगे और उनके विवाह की समस्याएँ पैदा नहीं होगी। 8. उत्तर : उत्तर दिशा शयनकक्ष के लिए उपयुक्त नहीं है, यहाँ शयन करने से बैचेनी हो सकती है। बच्चों के लिए इस दिशाका शयनकक्ष ठीक रहता है। अन्यों के लिए उचित नहीं है। 🍃ज्योतिषाचार्य डॉ उमाशंकर मिश्रा 🌼सिद्धिविनायक ज्योतिष एवं वास्तु अनुसंधान केंद्र विभव खंड 2 गोमती नगर 🍃वेद राज कंपलेक्स पुराना आरटीओ चौराहा लाटूश रोड लखनऊ 🌼94150 877 11 🍃🀹235 7 22996 󟀼󠰼󟀼󠰼󟀼󠰼?