#शिवरात्रिकाअर्थ १. शिव पार्वती के महामिलन के क्षण को #शिवरात्रि कहते हैं | २. पूर्णिमा को चन्द्रमा पूरा होता है | सूर्य से 180 अंश पर होता है | अगले दिन से वह कम होने लगता है अर्थात् वह सूर्य में कुछ कुछ समाने लगता है | चतुर्दशी आते आते वह सूर्य से एकाकार होने वाला ही होता है | बस, वही क्षण #शिवरात्रि है | ३. चन्द्रमा अर्थात् ‘आप’ अर्थात् ‘जीव’ और सूर्य अर्थात् ‘शिव’ अर्थात् ‘ब्रह्म’ | जब ‘ब्रह्म’ और ‘जीव’ एकाकार होने लगे तो वह महामिलन का क्षण है #शिवरात्रि | अर्थात् ‘ब्रह्म’ और ‘जीव’ के महायोग का क्षण है #शिवरात्रि | ४. सूर्य और चन्द्रमा आदि सभी ग्रह ‘गो’ हैं और आकाश इनका गोचर स्थान है | जब सूर्य चन्द्र गोचर करते करते चतुर्दशी को प्राप्त होते हैं अर्थात् चन्द्र का थोड़ा सा अस्तित्व रह जाता है, पूरा शून्य नहीं होता है, यही महायोग का क्षण #शिवरात्रि कहलाता है | ५. सूर्य अर्थात् ‘शिव’ और ‘चन्द्र’ अर्थात् मन | जब मन ‘शिव’ में एकाकार होने लगे, योग होने लगे तो वही क्षण #शिवरात्रि है | वह प्रति मास आती है | ६. सूर्य अर्थात् सूर्य नाड़ी, चन्द्र अर्थात् चन्द्र नाड़ी, दोनों का महामिलन क्षण अर्थात् सुषुम्ना प्राप्ति का, सहस्रार गोचर का महाक्षण ही #महाशिवरात्रि है | वह वर्ष में एक बार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को आती है | ७. कुण्डलिनी जाग्रत हो, सहस्रार चक्र में सुषुम्ना पहुँच जाए, और चन्द्रमा अर्थात् मन का शून्य सा अस्तित्व बचा रहे, आत्मा का शिव में, ब्रह्म में एकाकार होने का थोड़ा सा अस्तित्व बचा रहे, अर्थात् आत्मा ‘शिवत्व’ का अनुभव करे वह क्षण #शिवरात्रि है | ८. महाशिवरात्रि तो वर्ष में एक दिन आती है | किन्तु कुण्डलिनी जाग्रत् कर सहस्रार से झरने वाले अमृत का पान करने वाला योगी तो प्रति क्षण #शिवरात्रि का अनुभव करता है | ९. शिव जी ने तो विष पान किया था किन्तु योगी को वे अमृत पान कराते हैं | अर्थात् जो मिलकर चलते हैं वे अमर रहते हैं, यह दिग्दर्शन कराती है #शिवरात्रि | १०. #शिवरात्रि होने के लिए चन्द्रमा का, मन का, आत्मा का थोड़ा सा बचा रहना आवश्यक है, नहीं तो एकत्व का अनुभव कैसे होगा ! शिवत्व का अनुभव कौन करेगा ? ११. चन्द्र गोचर करता करता शून्य न हो और शिव दर्शन हो जाए | चन्द्र गो की रक्षा हो | इसी को ‘गोरक्ष’ कहते हैं | सूर्य ही शिव है और वे ही सूर्य चन्द्र के महायोग के कर्ता धर्ता हैं, इसलिए वे ही #शिवगोरक्ष हैं, शिवरात्रि के अधिष्ठाता हैं | अर्थात् #शिवरात्रि ही #गोरक्षरात्रि है | १२. सूर्य अर्थात् राजा, राज्य कर्ता और चन्द्रमा अर्थात् प्रजा दोनों का अस्तित्वमय एकत्व अर्थात् लोकतन्त्र ही #शिवरात्रि है | १३. सूर्य अर्थात् पुरुष, चन्द्र अर्थात् प्रकृति, और प्रकृति का संरक्षण है #शिवरात्रि | १४. सूर्य अर्थात् शिव, चन्द्र अर्थात् पशु और पशुपति की अवधारणा है #शिवरात्रि | १५. सूर्य अर्थात् दिन का समय, चन्द्र अर्थात् रात्रि का समय और महाकाल गणना की आधार भूमि उज्जयिनी है #महाशिवरात्रि ! १६. सूर्य अर्थात् नर, चन्द्र अर्थात् नारी और अर्धनारीश्वर का विज्ञान है #महाशिवरात्रि | १७. शिव अर्थात् पुराण, चन्द्र अर्थात् नित नवीनता और महाशिवपुराण की सरस कथा है #महाशिवरात्रि | १८. शिव अर्थात् प्राचीन, चन्द्र अर्थात् नित्य नवीन और भारत के एकत्व, हिन्दुत्व के अपनत्व का सम्भरण है #शिवरात्रि | १९. शिव अर्थात् पिता, चन्द्र अर्थात् माता अर्थात् संस्कार, और संस्कार युक्त सन्तान की संरक्षक है #शिवरात्रि | २०. शिव अर्थात् पति, चन्द्र अर्थात् पत्नी और दोनों का एक्य है #शिवरात्रि | आजकल के नारी स्वातन्त्र्य की विदेशी अवधारणा के विपरीत है यह नरनारी के एकत्व की उद्घोषक #शिवरात्रि | परिवार, समाज, राष्ट्र के एकत्व, सामंजस्य, पारस्परिक प्रेम और कर्तव्यनिष्ठा का अलिखित एवं नैसर्गिक संविधान है #शिवरात्रि | इसी अलिखित संविधान के लिए गुरु गोरक्षनाथ जी महाराज ने लिखा है – ‘लेखे लिखी न कागद मांडी, सो पत्री हम बांची’ इसी को ‘अलख’ को लखना कहते हैं | यही भारतीय परिवार व्यवस्था है, जिस अमृत के लिए सारा संसार तरसता है | यही #शिवरात्रि की शिक्षा है | #जयशिवगोरक्ष !